वोकल फॉर लोकल: एक स्थानीय कॉफी, जो आदिवासी समुदायों की आजीविका को मजबूत कर आंध्र प्रदेश का स्वाद दुनिया तक पहुँचा रही है
जालंधर ब्रीज: आंध्र प्रदेश के पूर्वी घाटों में स्थित अराकू घाटी अपने आदिवासी किसानों द्वारा उगाई जाने वाली अरेबिका कॉफी के लिए जानी जाती है। कॉफी की खेती यहां के कई स्थानीय परिवारों के लिए आय और आजीविका का एक महत्वपूर्ण साधन बन चुकी है।
अराकू घाटी की कॉफी की कहानी वर्ष 1863 से शुरू होती है, जब विजयनगरम के राजा ने अनंतगिरी के पास पहला कॉफी पौधा लगवाया। समय के साथ अराकू और इसके आसपास के क्षेत्रों में कॉफी की खेती का विस्तार हुआ। 1950 के दशक में कॉफी बोर्ड ने इसकी संभावनाओं का अध्ययन करने के लिए सर्वेक्षण किए, जबकि 1970 के दशक में आंध्र प्रदेश वन विभाग और एकीकृत आदिवासी विकास एजेंसी (ITDA) ने आदिवासी विकास के हिस्से के रूप में कॉफी की खेती को बढ़ावा दिया।
इसके बाद कॉफी बोर्ड द्वारा आदिवासी कॉफी उत्पादकों को तकनीकी और वित्तीय सहायता दी जा रही है। इसके तहत सीमेंट ड्राइंग यार्ड और बेबी पल्पर जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराई गई हैं। इससे एक आत्मनिर्भर व्यवस्था को बढ़ावा मिला है और आदिवासी कॉफी उत्पादकों को प्रीमियम ऑर्गेनिक और नेचुरल कॉफी तैयार करने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। वर्ष 2025 तक अराकू घाटी लाइजन जोन में आदिवासी कॉफी के पौधे लगाए जाने वाला क्षेत्र 19,169 हेक्टेयर और उत्पादन योग्य क्षेत्र 16,769 हेक्टेयर तक पहुंच गया था।
अराकू कॉफी कप तक पहुंचने से पहले एक सुव्यवस्थित प्रक्रिया से गुजरती है। इसकी शुरुआत कॉफी की खेती और पके हुए कॉफी फलों की तुड़ाई से होती है। इसके बाद बीन्स की प्रोसेसिंग और छंटाई की जाती है। चुनी गई बीन्स को फिर भुना जाता है, जिससे उनका स्वाद और खुशबू विकसित होती है। अंत में इन्हें पैक करके ब्रूइंग के लिए तैयार किया जाता है।
अराकू वैली अरेबिका कॉफी को वर्ष 2019 में जीआई (GI) पंजीकरण प्राप्त हुआ, जिससे इसकी भौगोलिक पहचान और इस क्षेत्र के साथ इसके विशेष संबंध को मान्यता मिली।
अराकू कॉफी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उस समय और पहचान मिली, जब नई दिल्ली में आयोजित G20 शिखर सम्मेलन के दौरान अराकू घाटी की कॉफी को G20 नेताओं को दिए जाने वाले उपहारों में शामिल किया गया। इससे भारत के क्षेत्रीय उत्पादों को वैश्विक स्तर पर प्रस्तुत करने में मदद मिली।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘मन की बात’ के 111वें एपिसोड के दौरान अराकू कॉफी का उल्लेख किया। उन्होंने इसके शानदार स्वाद और खुशबू की सराहना की और कहा कि लगभग 1.5 लाख आदिवासी परिवार इसकी खेती से जुड़े हुए हैं।
अराकू कॉफी “वोकल फॉर लोकल” की भावना को दर्शाती है। यह भारतीय किसानों और स्थानीय समुदायों द्वारा तैयार किए गए उत्पादों को अधिक पहचान दिलाने का एक उदाहरण है। स्थानीय स्तर पर तैयार की गई कॉफी को चुनने से स्थानीय किसानों के लिए मांग पैदा करने, वैल्यू चेन को मजबूत करने और आदिवासी क्षेत्रों में रोजगार एवं आय के साधनों को समर्थन देने में मदद मिल सकती है। विदेशी उत्पादों की ओर ही देखने के बजाय, उपभोक्ता अराकू कॉफी जैसे उत्कृष्ट भारतीय उत्पादों को प्रोत्साहित कर सकते हैं।

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