February 25, 2026

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बिहार में मतदाता सूची का “विशेष पुनरीक्षण”: लोकतंत्र की जड़ों को मज़बूत करने की दिशा में एक अहम कदम: एन. के. वर्मा

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जालंधर ब्रीज: बिहार में मतदाता सूची का “विशेष पुनरीक्षण”(SIR) केवल एक प्रशासनिक कवायद नहीं, बल्कि लोकतंत्र की जड़ों को मज़बूत करने की दिशा में एक आवश्यक और संवैधानिक प्रक्रिया है। चुनाव आयोग ने 2003 के बाद पहली बार इतने व्यापक स्तर पर यह कार्य शुरू किया है। बदलती सामाजिक संरचना, शहरीकरण, बड़े पैमाने पर प्रवासन, नए मतदाताओं की निरंतर बढ़ती संख्या और मृत अथवा अपात्र मतदाताओं के नामों को सूची से हटाने की आवश्यकता ने इस प्रक्रिया को समय की मांग बना दिया है।

संविधान का अनुच्छेद 324 चुनाव आयोग को स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने का अधिकार देता है, जबकि अनुच्छेद 326 तथा जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 21 मतदाता सूची को समय-समय पर अद्यतन करने की बाध्यता स्पष्ट करती है। इस लिहाज़ से SIR आयोग का अधिकार ही नहीं, बल्कि संवैधानिक दायित्व भी है। फिर भी, इस प्रक्रिया को विपक्ष ने राजनीतिक विवाद का विषय बना दिया है। कांग्रेस और कुछ अन्य दल इसे “वोट चोरी” की साजिश बताकर जनता को गुमराह करने का प्रयास कर रहे हैं। यह न केवल असत्य और भ्रामक है, बल्कि लंबित मामलों पर सार्वजनिक टिप्पणी कर न्यायपालिका और संविधान दोनों के प्रति असम्मान है। जब मामला सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन है, तो ऐसे आरोप संवैधानिक मर्यादा का उल्लंघन हैं।

मुख्य चुनाव आयुक्त ने विपक्ष के आरोपों को पूरी तरह आधारहीन और गुमराह करने वाला करार दिया है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि “वोट चोरी” जैसे शब्दों का प्रयोग भारत के संविधान और लोकतांत्रिक संस्थाओं का अपमान है। चुनाव आयोग ने सभी दलों से अपील की है कि वे मसौदा मतदाता सूची पर अपने दावे और आपत्तियाँ दर्ज करें, ताकि प्रक्रिया पारदर्शी और निष्पक्ष रूप से पूरी की जा सके।

वास्तविकता यह है कि कांग्रेस का इतिहास ही चुनावी धांधली से जुड़ा रहा है। 1952 में डॉ. भीमराव आंबेडकर जैसे संविधान निर्माता को हराने की साज़िश से लेकर 1957 में बूथ कैप्चरिंग की शुरुआत, 1975 की इमरजेंसी और 1987 में बड़े पैमाने पर हुई धांधली। यह सब कांग्रेस की ही देन रही है। आज वही कांग्रेस, जब लगातार चुनाव हार रही है, तो हार का दोष चुनाव आयोग, ईवीएम और अब मतदाता सूची पर मढ़ रही है। यह न केवल संस्थाओं को बदनाम करने की कोशिश है, बल्कि मतदाताओं का भी अपमान है।

लोकतंत्र की ताकत निष्पक्ष चुनाव में है, और निष्पक्ष चुनाव की पहली शर्त है—शुद्ध और पारदर्शी मतदाता सूची। यदि इस सुधारात्मक प्रक्रिया को राजनीतिक षड्यंत्र कहकर बाधित किया गया तो लोकतांत्रिक व्यवस्था कमजोर होगी। इसलिए यह आवश्यक है कि हर पात्र नागरिक का नाम सूची में शामिल हो, हर अपात्र नाम हटाया जाए और किसी भी मतदाता को अपने अधिकार से वंचित न होना पड़े।
विशेष पुनरीक्षण लोकतंत्र को मजबूत करने की प्रक्रिया है, न कि किसी राजनीतिक दल का एजेंडा। विपक्ष को चाहिए कि वह निराधार आरोपों के बजाय रचनात्मक सहयोग दे, ताकि भारत की चुनावी प्रक्रिया पर जनता का विश्वास और मज़बूत हो सके। यही लोकतंत्र की असली जीत हो


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