जालंधर ब्रीज:
किदरे छम – छम पैंदिया कणीयाँ,
किदरे धुप मारे चमकारे ।
पला च कालियाँ घटावा चड़ आवण,
झट उड़ जान दूर किनारे ।
आओ सखिओ वेख लवो,
इह हन सावन माह दे नजारे ।
धीयां बैन हो के इकठियाँ,
पिंगा ते रल मिल लेण हुलारे ।
सज विहाइयाँ पेके आइयां,
कई मानदियां खुशियाँ घर सोहरे ।
जीना दे दिलबर दूर गए परदेसी,
उह चित हौला करके करन गुजारे ।
हर पासे छाई हरिआली,
गुलजारां लागियाँ पारे चारे ।
माल पुडे ते बनन पकवान,
भांत भांत दे घरां विच सारे ।
इक सुरताल च पेंदा गिदा,
जिस दी सिफ़त होवे चारे -पासे ।
गुरमितों दा वेखन नू गिदा,
कई भूखे भाने फिरन विचारे ।
फ़कीरा करे अरदास रबा ,
आवे हर साल सावन खुशियाँ ले चफेरे ।
गुरलीन कौर करतारपुर

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